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भौगोलिक स्‍थिति

भौगोलिक द`ष्‍टि से यह मध्‍यप्रदेश के पश्चिमी भाग  में 23045, और 25055, उत्‍तरी अक्षांश तथा  74042,30,, पूर्वी देशान्‍तर  बीच समुद्र तल से  लगभग 1516 फीट उचॉई पर स्‍थित हैं । मंदसौर  के तीन और से  राजस्‍थान के समीप होने के कारण इसे  राजस्‍थान का सीमान्‍त प्रहरी  एवं  मालवा का सिंह द्वार भी कहा गया है। मन्‍दसौर क्षेत्र अरावली तथा विंध्‍य पर्वत श्रृखॅलाए क्रमश: उत्‍तर पश्चिम तथा दक्षिण पुर्व में फैली हैं । यहॉ की मिटटी अत्‍यन्‍त उपजाउ हैं, जो कि अफीम की खेती के लिए विश्‍वभर में प्रसिध्‍द हैं । इसी शस्‍य- श्‍यामलता के कारण दशपुर लोकजगत में  अन्‍नापूर्ण का वरदान कहा गया हैं । धन धन्‍य से परिपूर्ण इस क्षेत्र में उर्वरा भूमि के लिये के कबीर ने कहा हैं मालवा भूमि गहन गम्‍भीर  पग पग रोटी  डग डग नीर यहां की जलवायु सुखद हैं, न अधिक गर्मी न अधिक सर्दी । यहॉ  वर्षा का औसत 65 से 80 के बीच रहता हैं । यह क्षेत्र प्राकृतिक सम्‍पदा एवं वन्‍य प्राणियों से परिपूर्ण हैं । खनिज सम्‍पदा स्‍लेट पेन्सिल, यहॉ के आर्थिक जीवन पर प्रभाव डालती  हैं । स्‍लेट पेन्सिल को सफेद सोने की संज्ञा दी जाती हैं।

मंदसौर के प्राचीन नाम दशपुर का उल्‍लेख प्राचीन साहित्‍य एवं अभिलेख दोंनों में मिलता हैं। अभिलेखों में दशपुर का सर्वप्रथम उल्‍लेख द्वितीय शताब्‍दी ई.पू. के अवंलेश्‍वर स्‍तम्‍भ लेख में  हैं तत्‍पश्‍चात् क्षहरावंशीय  नहपान के जमाता (दामाद) उषवदात् के नासिक गुहा अभिलेख में दशपुर की गणना  भ्रगुकच्‍छ, सूर्पारक प्रभास  तथा  गोवर्धन पर्वतों के साथ की गई हैं। साथ ही इस अभिलेख में  यह भी उल्‍लेख हैं कि नहपान ने दशपुर में धर्मशालाऍ, उद्यान एवं तालाब निमार्ण के लोकापयोगी कार्य किये। इसके अतिरिक्‍त दशपुर जनपद से प्राप्‍त अभिलेखों में भी दशपुर का नामोल्‍लेख मिलता हैं । कुमार गुप्‍त प्रथम तथा बन्‍धुवर्मा  के अभिलेखों में दशपुर नगर को पश्चिमपुरम् कहा गया हैं । वत्‍सभट्टि ने अपनी प्रशिस्‍त में दशपुर नगर का सुन्‍दर वर्णन करते हुए इसे मालवा का शिरोभूषण कहा गया हैं । महाराज गौरी के आधित्‍यवर्धनकालीन खण्डित अभिलेखों में दशपुर को दसादिकपूरम्  कहा गया हैं । दशपुर नगर से ही प्राप्‍त  कुमारवर्मा के खण्डित  अभिलेख में दशपुर का नाम दशाहवयपुर उल्‍लेखित हैं । साहित्‍य में दशपुर नाम का उल्‍लेख स्‍कंदपुराण, मार्कण्‍डेपुराण, मेघधुत, राजतरंगिणी, कादम्‍बरी, वृहत्‍तसंहिता, अमरकोष, के साथ जैन साहित्‍य और  बौघ्‍द साहित्‍य में भी मिलता हैं। स्‍कंदपुराण में इस क्षेत्र को  दशारण्‍य कहा गया हैं। मार्कण्‍डेपुराण में दशपुर की गणना आभीर, अवन्ति तथा आकर के साथ की गई हैं। महाकवि कालिदास ने अपने  प्रसिघ्‍द ग्रंथ मेघदूत में उल्‍लेख किया  हैं। वे मेघ को को अपनी नगरी अलका की ओर जाने का मार्ग बताते हुये रामिगिरी से विदिशा व उज्जियनी जाते हुए विशेष रूप से दशपुर जाने को कहता हैं, जहॉ की रमणियों के नेत्रों के सौन्‍दर्य का वर्णन कालिदास की लेखिनी ने इन शब्‍दों में किया हैं-

तामुत्‍तीर्य व्रज परिचित भूलताविभ्रमाणां,पक्ष्‍मोत्‍क्षेपादुपरि विलसतकृष्‍णसार प्रभाणाम्।

कुन्‍दक्षेपानुगमधुकर श्रीमुषामात्‍म् बिम्‍बं,पात्रीकुर्वन् दशपुर वधुनैत्र कौतूहलानाम्। 

( हे मेघ चम्‍बल पार कर तुम दशपुर पहुंचोगे,उस दशपुर में जहां रमणियॉ अपने  कटीलें कक्षाओं से  विलोकने में चतुर जानी जाती हैं, वे अपनी बरौनियॉ उठाकर तुम्‍हें निहारेंगी, तो उनके नयनों की श्‍वेत- श्‍यामप्रभा, ऐंसी लगेगीं मानों डोलते कुन्‍द- कुसुम पर मंडराते भौंरों की छटा उन्‍होनें चुरा ली हों)

मेघदूत में अभिवर्णित उपरोक्‍त सौन्‍दर्य वर्णन  तथा अन्‍य कतिपय तथ्‍यों के आधार पर बंगाल के महामोपाध्‍याय स्‍व. हरिप्रसाद शास्‍त्री और नागपुर के डा. केदारनाथ शास्‍त्री जैसें विद्ववान को अभिमत हैं क‍वि कालीदास की जन्‍मभूमि भी यही दशपुर रही हैं। मेघदूत के टीकाकार मल्लिनाथ के अनुसार दशपुराधिपति महाराजा रन्तिदेव द्वारा यहॉ ग्‍वालम्‍भ यज्ञ किया गया । उस यज्ञ के चर्म समूह से जो सरिता प्रवाहित हुई,  उसे चर्मवती (चम्‍बल) नाम दिया गया। श्‍यामल कवि द्वारा रचित पादताडिकम् में दशपुर निवासी को दाशरेक कहा गया हैं। तथा दशपुर के राजा को दाशरेकाधिपति कहा गया हैं। राजशेखर अपनी काव्‍यमीमॉसा में  मध्‍यप्रदेश के कवियों को तत्‍कालीन सभी भाषाओं के पण्डित बताते हुए कहता है  कि दशपुर के निवासी भूतभाषा की सेवा करते हैं। बाण्‍भटटृ ने अपनी प्रसिघ्‍द कादिम्‍बरी रचना में इस नगर को दशपुर कहा हैं, उसके अनुसार कुमार चन्‍द्रापीड वैशम्‍पायन से मिलकर इन्‍द्रा युद्ध अश्‍व पर सवार हो क्ष्रिपा पार कर रातों रात तीन योजन की यात्रा कर दशपुर स्थित स्‍कन्‍धावार में  पहुंचता हैं। उपरोक्‍त संस्‍क`त साहित्‍य के अतिरिक्‍त अनेक जैन ग्रंथों में दशपुर का उल्‍लेख है। इसमें जैन आगम आवश्‍यकव`त्‍ति दशवैकालिक आवश्‍यक चूर्णि उत्‍तराध्‍ययनसूत्र नन्‍दीसूत्र विविध तीर्थ कल्‍प जैन तीर्थ माला एवं त्रिष्‍ठीशलाका पुरूषचरित आदि ग्रंथ की रचना की। दशपुर नगर में ही आर्यरक्षित सूरी ने जैन आगमों को धर्म कथानुसोग चरणानुयोग द्रव्‍यानुयोग गणितानुयोग नामक चार अनुयोगों में विभक्‍त किया जिससे आगमों की दुरूहता कम हुई और सहजता से सार ग्रहण किया जाने लगा। इस प्रकार दशपुर का उ ल्‍लेख जैन तीर्थ के रूप में होता है। संवत 1561 में साण्‍डेर सूरी द्वारा रचित ललिताचरित में भी दशपुर का वर्णन मिलता है। यद्यपि बौद्ध साहित्‍य में दशपुर नाम का स्‍पष्‍ट उल्‍लेख नहीं मिलता है किन्‍तु हेनसांग का मानना है कि मालवा में लगभग सौ संघाराम थे जिनमें सहस्‍त्र भिक्षु विद्यमान थे। आज भी यहॉं विद्यमान बौद्ध गुफाऍं व शैलोत्‍कीर्ण विहार तथा स्‍तूप इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म के तत्‍कालीन अस्‍तित्‍व के साक्षी है। मंदसोश्र के मूल नाम दशपुर के उद्भव के विषय में अनेक मत प्रचलित है। तारीख ए मालवा के लेखक मुंशी सईद करीम अली मीर मुंशी के अनुसार इस नगर को पहले रामचन्‍द्र अवतार के पिता राजा दशरथ ने बसाया था तथा इसका नाम दशरथपुरी रखा। अनुश्रुतियों के अनुसार भी राजा दशरथ के नाम पर इस पगर का नाम दशपुर पडा। ऐसा माना जाता है कि मन्‍दसौर के नजदीक श्रवण नाले के किनारे दशरथ के बाण से अंधे माता पिता की एकमात्र संतान श्रवण कुमार की म`त्‍यु हुई थी। यहॉं खंडित तोरणद्वार के एक स्‍तम्‍भ प‍र स्‍त्री पुरूष एवं बालक की आक`ति उत्‍कीर्ण है इसे श्रवण व उसके अंधे माता पिता माना गया है। जैन आगम आवश्‍यक सुत्र की चुर्णि नियुक्ति और व`त्ति के अनुसार भगवान महावीर के समय सिन्‍धु सोवीर देश के भीतभयपुर पतन के राजा उदयन के यहॉ महावीर स्‍वामी (जीवंत स्‍वामी) की एक प्रतिमा थी। राजा उदयन एवं उसकी रानी प्रभावती उस प्रतिमा की पूजा करते थे। प्रभावती की म`त्‍यु के पश्‍चात इस प्रतिमा की पुजा का कार्य देवदत्‍ता नामक दासी को सौंपा गया। देवदत्‍ता का उज्‍जयिनी के राजा चण्‍डप्रद्योत से प्रेम हो गया। फलत: चण्‍डप्रद्योत ने वैसी ही दूसरी प्रतिमा बनाकर वहॉं रख दी एवं मूल प्रतिमा व दासी को अपने साथ ले गया। जब राजा उदयन को दासी व प्रतिमा के अपहरण की बात ज्ञात हुई तो उसने दस अन्‍य राजाओं के साथ चण्‍डप्रद्योत का पीछा किया और उसे पकड कर अपने साथ कैद काके ले आया। रास्‍ते में वर्षा ऋतु आ जाने से उदयन राजा को एक जंगल में पडाव डालना पडा। सुरक्षा के लिए उसके साथी राजाओं ने मिटृटी के दस किले बनाकर अपना अपना पडाव उसमें डाल दिया । इस तरह दस छोटे छोटे पुर बस जाने से इस स्‍थान का नाम दशपुर प्रसिद्ध हो गया। जिसे प्राकृत भाषा में दस उर कहते हैं यही आगे चलकर दसौर हुआ तथा कालान्‍तर में समीप ही मड नामक स्‍थान से संबद्ध होने के फलस्‍वरूप मड दसौर हुआ तथा परिमार्जन के पश्‍चात् परिष्‍कृत होकर मन्‍दसौर हो गया। इससे यह स्‍पष्‍ट है कि दशपुर नगर की स्‍थापना लगभग छठी शताब्‍दी ईस्‍वी पूर्व में हो गई थी। फ्लीट के अनुसार दस मोहल्‍ले के एकीकरण के पश्‍चात् इस नगर का नाम दशपुर पडा, जो पुरा कहलाते है। जिनके नाम इस प्रकार है खानपुरा,  खाजपुरा,  खिलचीपुरा,  चन्‍द्रपुरा,  मदारपुरा, नरसिंहपुरा, कागदीपुरा,  जगतपुरा,  डिब्‍बीपुरा व नयापुरा। इस नगर की उत्‍पत्ति के विषय में तारीख-ए-मालवा में उल्‍लेखित कथा के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी ने इस नगर को पुन: बसाया था। जब यह नगर आबाद हुआ तो गुजरात का माल यहॉं आकर बिकने लगा और यह दिसावर अर्थात् दूसरा देश नाम से प्रसिद्ध हो गया। आगे चलकर दिसावर का दिसौर और दसौर रह गया। भगवानलाल इन्‍द्रजी के अनुसार मुस्लिम आक्रमण के फलस्‍वरूप जब दशपुर का प्रभाव मंद पड गया तो इस नगर का नाम मन्‍दसौर पड गया। एक मत यह भी है कि गुप्‍तकाल में यहॉं भव्‍य सुर्य मंदिर था संभवत: इसी के आधार पर मढ (मंदिर) व सौर (सूर्य) मन्‍दसौर नाम पडा है।

शोधर्मन स्‍तम्‍भ् और अभिलेख- स्‍तम्‍भ व अभिलेख में रूचि रखने वाले पर्यटकों के लिये मंदसौर के निकट सौधनी ग्राम स्थित यशोधर्मन के स्‍तम्‍भ आकर्षक का केन्‍द्र हैं। इन स्‍तंभों में यशोधर्मन की वीरता एवं हूणों पर विजय का वर्णन हैं। इतिहास प्रेमी पर्यटकों को यह स्‍तम्‍भ सुखद अनुभूति का बोध कराते हैं । विश्‍व में प्रथम विज्ञापन की जानकारी देने वाला बन्‍धुवर्मा का अभिलेख भी इस नगर में प्राप्‍त हुआ हैं।

 

शुपतिनाथ मन्दिर परिसर मंदिर परिसर में श्री रणवीर मारूति मंदिर के दाहिनी ओर श्री जानकी नाथ मंदिर, पश्चिमदिशा में थोडी दूर स्‍वामी श्री प्रत्‍यक्षानन्‍द महरराज की प्रतिमा प्रतिष्ठित हैं। आगे की ओर बाबा मस्‍तराम महाराज की समाधि हैं। सिंहवाहिनी दुर्गा माता मंदिर, श्री गायत्री मंदिर, श्री गण‍पति मंदिर, श्री राम मंदिर, श्री बगुलामुखी माता मंदिर, श्री तापेश्‍वर महादेव मंदिर, सहस्‍त्र मंदिर भी परिसर स्थित हैं।

 

गॉधीसागर बांध प्राकृतिक सौन्‍दर्य- प्राचीन स्‍मारकों से भरपूर इस जिले में आधुनिक तीर्थ स्‍थल  गॉधीसागर बॉध भी विद्यमान हैं। जो प्राकृतिक सौन्‍दर्य से युक्‍त हैं। विज्ञान एवं तकनीक में रूचि रखने वालो के लिये विद्युतगृह देखने की व्‍यवस्‍था भी यहॉ हैं । सुन्‍दर विद्यमान में स्थित चम्‍बल माता की प्रतिमा आर्कषण का केन्‍द्र हैं,  जिसे प्रतीकात्‍मक ढंग से राजस्‍थान व मध्‍यप्रदेश की जीवनदायिनी के रूप में अंकित किया गया हैं। बरसात में समस्‍त जिले से पर्यटक यहॉ आते हैं। यहॉ स्थित वन्‍य क्षेत्र में अभ्‍यारण्‍य के रूप में विकसित होने की पूर्ण क्षमता निहित हैं अभी भी कई लोग वन्‍य जीव देखने यहॉ आते हैं।

दुना - लदुना स्थित सेवाकुजं (विशाल झील के बीच बना एक मंदिर) प्राकृतिक सौन्‍दर्य से युक्‍त एक अत्‍युत्‍तम स्‍थल हैं। शांत, सुरम्‍य, प्राकृतिक सौन्‍दर्य युक्‍त यह स्‍थान काफी अच्‍छा पर्यटन स्‍थल हैं।

 

र्मराजेश्‍वर मंदिर - धर्मराजेश्‍वर मंदिर जिले की शैलोत्‍कीर्ण आदर्श की उत्‍कृष्‍ट कृति हैं। आठवी शताब्‍दी में निर्मित इस मंदिर की तुलना एलौरा के कैलाश मंदिर से की जाती हैं क्‍योकिं धर्मराजेश्‍वर  का यह मंदिर भी कैलाश मंदिर की भॉति एकाष्‍म शैली में निर्मित हैं, जिसमें चटृटान को खोखला कर के ठोस प्रस्‍तर शिला को देवालय में परिवर्तित किया जाता हैं। सुन्‍दरता विशालता और उत्‍कृष्‍टता लिये हुए यह मंदिर 54 मीटर लम्‍बी 20 चौडी तथा 09 मीटर गहरी शिला को तराशकर बनाया गया हैं। जो उपर से समतल दिखाई देता हैं। उत्‍तर भारतीय मंदिर की भांति इस मंदिर में भी द्वार मण्‍डप, गर्भगृह  व शिखर निर्मित हैं। मध्‍य में एक बडा मंदिर हैं, जिसकी लम्‍बाई 1453 मीटर तथा चौडाई 10 मीटर हैं जिसका उन्‍नत शिखर आमलक तथा कलश से युक्‍त हैं इस मंदिर में महामण्‍डप की रचना पिरा‍मिड आकार में उत्‍कीर्ण की गई हैं। मंदिर की सुन्‍दर तक्षणकला आगुन्‍तको को पत्‍थर में कविता का बोध कराती हैं।

       मंदसौर क्षेत्र के नागरिको ने शहजादा फिराज के नेतृत्‍व में 1857 के स्‍वतंत्रता सग्राम में अंग्रेजो से तीन दिन तक सघर्ष किया । जिसमें अंग्रेज अधिकारी रेडमेन गुराडिया में मारा गया। मराठा शासनकाल में मंदसौर सहित इस जिले का कुछ भाग ग्‍वालियर के सिधियां शासको के शासनकाल में रहा तो कुछ भाग होल्‍कर शासको के अधीन रहा,  सीतामउ स्‍वतंत्र रियासत थी। मंदसौर नगर का द्रुतगति से विकास सिधिंया के शासनकाल में हुआ । इन्‍होने अनेक भवन, सडके, जल व्‍यवस्‍था  तथा नगर पालिका की स्‍थापना करके विकास के ढांचे को संरचना प्रदान की।

 

हिंगलाजगढ दुर्ग मन्‍दसौर जिले का हिंगलाजगढ दुर्ग भी वस्‍तु-वैभव की उत्‍कृष्‍टता से यह वन्‍य दुर्ग प्राकृतिक सुषमा से युक्‍त एवं शक्‍टाकार आकार में निर्मित है। इनमें तोपें दागने के लिए बुर्जें एवं बन्‍दूकें दागने के खॉंचे बने है। इस जिले में हिंगलाजगढ के अतिरिक्‍त दशपुर,  लदूना,  अठाना में भी दुर्ग स्थित है।

 

शवंतराव होल्‍कर की छत्री मन्‍दसौर जिले में स्थित स्‍मारकों की श्रृंखला में सर्वाधिक सुन्‍दर स्‍मारक भानपुरा स्थित होल्‍कर की छत्री है जो मराठायुगीन वास्‍तु शिल्‍प की अति उत्‍तम अभिव्‍यक्ति है। चारों और उँची दीवारों से घिरी इस छत्री की रचना एक दुर्ग के समान है। दीवारों पर बन्‍दुकें दागने के खॉंचे व बुर्जियॉं बनी है। विशाल परिसर में निर्मित इस छत्री के गर्भगृह में यशवंतराव होल्‍कर की संगमरमर की प्रतिमा है। प्रतिमा की दाडी में लगा हीरा एवं छत्री का बाहरी भाग पर्यटकों के आकर्षण का केन्‍द्र है जो अत्‍यंत सुंदर ढंग से निर्मित है।

 

मूर्तिकला इस क्षेत्र की मूर्तिकला देश में ही नहीं वरन विदेशों में अपनी उत्‍कृष्‍टता के लिए पहचाना जाती है। हिंगलाजगढ से प्राप्‍त नंदी व उमामहेश्‍वर की प्रतिमाओं ने क्रमश: फ्रांस एवं वॉशिंगटन में आयोजित भारत महोत्‍सव में अपनी अनुपम कला की अमिट छाप दर्शकों पर अंकित की।

 

चित्रकला पर्यटक के मन में लीक से हटकर कुछ नया देखने की लालसा होती है मन्‍दसौर जिले में शैलचित्र एवं भित्तिचित्र ऐसे ही आकर्षण है। आदिमानव के आश्रम स्‍थल अनेक शैलाश्रय चिल्‍वरनाला चतुर्भुजनाथ जिले में मौजुद है इनकी छतों पर मानव ने प्राकृतिक रंगों से अनेक चित्र बनाए है, जो तत्‍कालीन मानव जीवन के सभी पहलुओं को अभिव्‍यक्ति प्रदान करते हैं। शैलचित्रों के अतिरिक्‍त कला की दूसरी विधा भित्तिचित्र भी मन्‍दसौर नगर की हवेलियों में रेखांकित है।