भवः शर्वो रूद्रः पशुपतिरयोग्रः सहमहां स्तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम्। अमुष्मिन प्रत्येक प्रविचरित देव श्रुतिरपि प्रिया यास्मे धाग्ने प्रविहितनमस्योस्मि भवते।।
 
 
 
हे देव:भव शर्व रूद्र उग्र महादेव भीम ईशान ये जो आपके आठ नाम हैं इनमें प्रत्‍येक वेदस्‍मृतिपुराणतत्रं आदि में बहुत भ्रांति हैं अतएव हे परमप्रिय मैं तेज स्‍वरूप को मन वाणी और शरीर से नमस्‍कार करता हुं।
नगर के दक्षिण में बहने वाली पुण्‍य सलिला शिवना के दक्षिणी तट पर बना अष्‍टमुखी का मंदिर इस नगर के प्रमुख आकर्षण का केन्‍द्र हैं। आग्‍नेय शिला के दुर्लभ खण्‍ड पर निर्मित शिवलिंग की यह प्रतिमा है।
2.5*3.20 मीटर आकार की इस प्रतिमा का वजन लगभग 46 क्विंटल 65 किलो 525 ग्राम हैं। सन् 1961 ई में श्री प्रत्‍यक्षानन्‍द जी महाराज द्वारा मार्गशीर्ष 5 विक्रम सम्‍वत् 2016 ( सोमवार 27 नवम्‍बर 1961) को प्रतिमा का नामकरण किया गया एवं प्रतिमा की वर्तमान स्‍थल पर प्राण प्रतिष्ठा हुई ।
प्रतिमा की तुलना नेपाल स्‍थित पशुपतिनाथ प्रतिमा से की जाती है, किन्‍तु नेपाल स्थित प्रतिमा में चार मुख उत्‍कीर्ण हैं, जबकि यह ऐतिहासिक प्रतिमा भिन्‍न भिन्‍न भावों को प्रकट करने वाले अष्‍टमुखों से युक्‍त उपरी भाग में लिंगात्‍मक स्‍वरूप लिये हुऐ हैं ।
इस प्रतिमा में मानव जीवन की चार अवस्‍थायें- बाल्‍यकाल, युवावस्‍था, प्रोढावस्था व वृध्‍दावस्‍था का सजीव अंकन किया गया हैं ।
सौन्‍दर्यशास्‍त्र की दृष्टि से भी पशुपतिनाथ की प्रतिमा अपनी बनावट और भावभिव्‍यक्ति में उत्‍कृष्‍ट हैं। इस प्रतिमा के संबंध में यह एक देवी संयोग ही रहा कि यह सोमवार को शिवना नदी में प्रकट हुई। रविवार को तापेश्‍वर घाट पहुंची एवं घाट पर ही स्‍थापना हुई ।
सोमवार को ही ठीक 21 वर्ष 5 माह 4 दिन बाद इसकी प्राण प्रतिष्‍ठा सम्‍पन्‍न हुई। मंदिर पश्चिमामुखी है। पशुपतिनाथ मंदिर 90 फीट लम्‍बा 30 फीट चौडा व 101 फीट उंचा हैं ।
इसके शिखर पर 100 किलो का कलश स्‍थापित है, जिस प‍र 51 तोले सोने का पानी चढाया गया हैं। इस कलश का अनावरण 26 फरवरी 1966 स्‍व राजामाता श्रीमती विजयाराजे सिंधिया द्वारा किया गया था । प्रतिमा प्रतिष्‍ठा की शुभ स्‍मृति स्‍थापना दिवस को पाटोत्‍सव के रूप में प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता है एवं मेले का आयोजन किया जाता हैं ।
मेला प्रतिवर्ष कार्तिक एकादशी से मार्गशीर्ष कृष्‍णा पंचमी तक आयोजित किया जाता है।